काशी मेँ किसी को कोई दिक्कत नहीँ होती है. महादेव की कृपा सब पर बनी रहती है. एक बार मैँ और बनारस अमर उजाला के तत्कालीन स्थानीय सँपादक सँजीव क्षितिज शिवगँगा एक्सप्रेस से दिल्ली से बनारस आ रहे थे. उन्होँने यह किस्सा सुनाया. आप भी सुनिये.
सँजीव एक बार अपने घर से दफ्तर जाने के लिए कार से निकले. रास्ते मेँ जाम मेँ फँस गये. दफ्तर मेँ जरूरी मीटीँग थी. सँजीव कार से निकल बेचैन होकर चहलकदमी करने लगे. एक आदमी उनकी बेचैनी देख रहा था. आखिरकार उसने पूछ ही लिया, भाई साहब, जल्दी है क्या? सँजीव बोले, हाँ, दफ्तर मेँ जरूरी मीटिँग है, समझ नहीँ आ रहा, जाम कब खत्म होगा. उस आदमी ने कहा, अगर जल्दी जाना है तो कार बैक कीजिए और उस सामने वाली गली से आगे बढ कर दूसरे मोड से दाहिने मुड जाईए, सडक पर आ जाएँगे, दफ्तर टाईम पर पहुँच जाएँगे.
सँजीव बडे खुश हुए. फिर उन्होने उस आदमी से पूछा, आपको कहाँ जाना है. उस आदमी ने कहा, मुझे भी उसी तरफ जाना है. सँजीव बोले, फिर आप क्योँ नहीँ इस रास्ते से निकल जाते? उस आदमी ने कहा, हम्मैँ कउनो जल्दी ना हौ.
यही काशी है, यहाँ भोलेनाथ के गण रहते हैँ. दुनिया कितनी भी रफ्तार क्योँ न पकड ले, यहाँ के लोग--रजा! पान घुलावा, मस्त रहा--के मँत्र पर जीवन जीते हैँ.
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6 टिप्पणियाँ:
बहुत सही भाय। चंपल रहा।
तई सा एक दिन अस्सी पर जाएके डाक्टर गया सिंह क एक्खे इंटरव्यू ले के फोटो के संगे छाप देता मजा आय जात।
अपने ही ढब के ब्लाग के लिए बधाई।
रजा! पान घुलावा, मस्त रहा.. :)
sahi kaha guru kintu ye batao baba ki nagarii me mastii ki baat kahne wale aap ne ye moderation kikkhidakii kyon laga rakhii hai lagata hai aap banaras ke mool yani apni bebaak kamment ko teep kar fenk dene se kuch daratein hai
hataiye is moderation ke janjaal ko warna banaras ki mastii aur ajadpan khayalaton ki baat karana ek khantii banarasi ko shobhaa nahin deta aur naa aapka sirshak hi ki jiya raja banaras
jab aapne nara laga diya to moderation ki chippi aur pratibandh kaisaa
वाह! मजेदार। हम जब बी.एच.यू.में पढ़ते थे तो बनारस के बारे में सुना यह डायलाग सुना था-" बनारस इज ए सिटी व्हिच हैव रिफ़्यूज्ड टु मार्डनाइज इटसेल्फ़!"
आपके लेख पढ़ने में मजा आता है। आप अपने ब्लाग से वर्ड वेरीफ़िकेशन हटा दें। टीपने में आसानी रहेगी।
सही बात है भाई। भगवान भोले नाथ के त्रिशूल पर बसी नगरी की बात ही कुछ और है।
अच्छा लगा. बनारस के बारे में काफी समय के बाद पढ़ के. सही में बनारस की मस्ती का जबाब नहीं. आपने गौर किया होगा कि - इस कहानी में किस तरह से उस बन्दे ने बिना मांगे सलाह दी और सहायता की. ये बनारस के लोगों का एक और गुन है.
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